आज देखा है एक गरीब का आशियाना , आज ही जाना, कितना मुश्किल है ईस दुनिया मे एक गरीब का जी पाना | अरे अन्दर की तो सुनिये साहब, भूल जाईये गा पलकें झपकाना | एक ही थी रोटी, जिसमें चार को था खाना | अब तक तो बूढी मां ने शुरु कर दिया [...]
Archive for the ‘Poetry’ Category
गरीबी
Posted in Poetry on February 17, 2009 | 2 Comments »
मशाल
Posted in Poetry on January 26, 2009 | Leave a Comment »
निकला तो था मैं सूरज की पहली किरण के साथ, आंख खुली तो देखा, ये सवेरा मेरा नहीं है, ये तो बसेरा मेरा नहीं है| ये जो खो गया है ऊस अन्धकार में, है तो किसी का अतीत ही, पर वो मेरा नहीं है, कयों कि मेरा अतीत, मेरा भविष्य और वर्तमान, ईसी सूर्य के [...]